आरती का महत्व क्या है, और पूजा के अंत में क्यों की जाती है आरती?

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दोस्तों हर किसी के मन में कभी न कभी यह सवाल तो जरूर उठता है कि आरती का महत्व क्या है, और पूजा के अंत में क्यों की जाती है आरती ? हमारे हिंदू धर्म में आरती एक प्रकार का शास्त्र ही है। जिसे हम गाकर अपने भगवान या इष्टदेव को प्रसन्न कर सकतें हैं।आरती गाने या सुनने से इंसान अपने दुःख या गम को भुलाकर खुश होकर झूमने लगता है। सनातन धर्म में मान्यता है कि जिस व्यक्ति को पूजा की विधि और मंत्र मालूम न होने पर भी व्यक्ति आरती करता है तो ईश्वर उसे स्वीकार कर लेता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति आस्था और विश्वास से प्रभु को प्रसन्न कर सकता है और आरती इस आस्था और विश्वास को बांधे रखने की एक डोर है जिससे व्यक्ति को खुशी भी मिलती है। साथ ही उस व्यक्ति की भगवान के प्रति उसकी आस्था भी अटूट होती जाती है । यही आरती का महत्व है और इसलिए पूजा के अंत में आरती की जाती हैं।

जब हम किसी भी देवी – देवता या अपने इष्टदेव की पूरी विधि विधान से पूजा कर बाद में धूप, दीप, कपूर, या सुगंधित अगरबत्ती से आरती करतें हैं उसके बाद ही हमारी पूजा सम्पन्न मानी जाती है। खासतौर पर मंदिरों और कई पवित्र स्थानों पर आरती में शामिल होकर नज़ारा देखते ही मन खुश हो जाता है।

आरती को हमेशा पूजा के अंत में ही किया जाता है। आरती को हम धूप, दीप, अगरबत्ती या कपूर से कर सकतें है। आरती करने के लिए दीपक (किसी भी आरती सामग्री को ) हमेशा दाएं हांथ में लेकर बाएं हाथ से दाएं हांथ की कोहनी को साध कर या घंटी बजाते हुए जिस देवी-देवता की आरती कर रहें है उनके मुख मंडल के बाएं से दाएं ओर की ओर घुमाकर आरती गायन करके आरती करनी चाहिए।

आरती में शामिल या आरती करते समय भक्त का मन एक दम स्वच्छ होना चाहिए। इसके जिस देवी – देवता की आरती कर रहे है उसे की प्रतिमा को मूर्ति की तरह नही सजीव प्रतिमा समझ कर अपने विश्वास, आस्था, और समर्पण भाव के साथ ही आरती करने से आपके जीवन में पुण्य फल की प्राप्ति होती है जिससे आपका संपूर्ण जीवन खुशियों से भर जाता हैं।

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